Wednesday, 10 February 2016

“महाशून्य के सत्संग का कुछ अंश “ कर्मो से मुक्ति –केवल आत्मज्ञानी ही मुक्त होता है ” इंदौर के साप्ताहिक समाचार पत्र “ग्रीन लाइफ “- इंदौर (म.प) ( सप्ताह-१४ नवम्बर से २० नवम्बर ’२०१५ ) के अंक में छपा था ।“ “A part of Talk of Mahashunya on " Karmo Se Mukti-Keval Atmagyani Hi Mukt Hota Hai " published in weekly newspaper " Greenlife ,Indore (MP)-Week from 14 th November to 20 th November '2015."

“महाशून्य के सत्संग का कुछ अंश “ कर्मो से मुक्ति –केवल आत्मज्ञानी ही मुक्त होता है ” 

महाशून्य का सत्संग “प्रेम गली अति साकरी...” इंदौर के साप्ताहिक समाचार पत्र “ग्रीन लाइफ “-इंदौर (म.प) ( सप्ताह-३१ अक्टूबर से ६ नवम्बर’२०१५ ) में छपा था Talk of Mahashunya on " Prem Gali Ati Sakri " published in weekly newspaper " Greenlife ,Indore (MP)-Week from 31 st Oct to 6 th Nov'2015"

महाशून्य का सत्संग “प्रेम गली अति साकरी...”


Love is Celebration : प्रेम उत्सव है

प्रेम उत्सव है : 

श्रीकृष्ण का प्रेम बेशर्त है, वे सभी को संमान प्रेम करते हैं लेकिन प्रेम कि अनुभूति सभी के भीतर उनके अहंकार के हिसाब से अलग अलग होती है, जिसका अहंकार पूरा मिट जाता है उसके भीतर पूर्ण प्रेम प्रकट हो जाता है । कृष्ण का प्रेम उत्सव है, नाच है, बांसुरी कि मधुर धुन है, संगीत है, आनंद है, रासलीला है ।
यदि तुम प्रेम करते हो तो कभी भी दुखी नहीं होगें, जो लोग प्रेम करते है वे सदा आनंदित रहते है, प्रसन्न रहते है और उनके जीवन में मिठास होती है ।
पिया खोलो किवाड़
अपने भीतर कि सारी गठानों को खोल दो, लोगो को अपने भीतर आने दो, अहंकार रूपी दरवाजा खोल दो, प्रेम में जीना प्रारंभ करो और पूरी पृथ्वी को प्रेम से भर दो तभी तुम वास्तविक जीवन का आनंद ले पाओगे, तभी जीवन सार्थक होगा, आनंदित होगा, प्रफुल्लित होगा ।
मीरा ने कहा है :
प्रेम गीत है मधुर आत्मा से गाये जाओ

प्रेम है द्वार स्वर्ग का ,
प्रेम मौन का संगीत है ।~~महाशुन्य

Love Without Reason : अकारण प्रेम

अकारण प्रेम

प्रेम किसी कारण से नहीं होता है, प्रेम अकारण होता है क्योंकि अगर प्रेम किसी कारण से हुआ तो जब भी कारण हटा तो प्रेम भी तिरोहित हो जायेगा ।
एक बार गौतम बुद्ध के पास आकार एक व्यक्ति ने उनके मुहं पर थूक दिया । बुद्ध ने उसे कपड़ें से पोंछकर कहा –‘और कुछ कहना है ?’ उस व्यक्ति ने कहाँ –‘मैंने कुछ कहा नहीं है ,थूका है ।

बुद्ध ने कहा –तुम अभी क्रोध में हो और क्रोध प्रकट करने के लिए तुम्हारे पास शब्द नहीं है इसीलिए थूककर अपना रोष प्रकट कर रहे हो । 
वह व्यक्ति चला गया ,लेकिन अगले दिन आकार माफ़ी मांगने लगा । 
बुद्ध ने कहा –‘ तुम मुझ पर ना थूकते थे इस कारण थोड़ी न मैं तुमसे प्रेम करता हूँ, मेरा प्रेम तो सदा है, मैं प्रेम करने पर विवश हूँ सभी को अकारण । सदगुरुओ का प्रेम अकारण होता है ।

जहाँ प्रेम है वहां भय नहीं और जहाँ भय है वहा प्रेम नहीं । भय और प्रेम साथ साथ नहीं हो सकते है ।"~~महाशुन्य

Atamic Milan : आत्मिक मिलन

आत्मिक मिलन

दो शरीरों का मिलन असंभव है चाहे कितना ही पास आ जाये क्योंकि वहा केवल काम है ,प्रेम नहीं । लेकिन जहाँ दो मन मिलते है वहा भी प्रेम कि केवल शुरुआत हो पाती है क्योंकि मन भी पुरे कभी नहीं मिल पाते है, सबके अपने अपने सोचने का ढंग है, विचार है, इच्छाये है, कामनायें है, अपने अपने जीने का ढंग है, परन्तु जब दो आत्मायें मिलती है तब प्रेम का कमल खिलता है, तब प्रेम अपनी पूर्णता को प्रेमा-भक्ति को उपलब्ध होता है, प्रेम कि पराकाष्टा को उपलब्ध होता है ।

पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय
 
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय


कबीर कहते है जिसने प्रेम को वास्तविक रूप में अनुभव कर लिया, जी लिया, जो प्रेम में एक हो गया वही वास्तविक पंडित है । वह पंडित नहीं है जिसने शास्त्रों को रट लिया और प्रेम कि व्याख्या शब्दों से कर रहा है लेकिन कभी प्रेम कि अनुभूति से नहीं गुजरा ।

प्रीतम छबि नैनन बसी, पर छबि कहा समाये

परमात्मा के प्रेम को परमात्मा होकर ही जाना जा सकता है, व्यक्ति होकर नहीं, यह कभी नहीं हुआ है, न ही हो रहा है और न ही कभी हो सकता है क्योंकि जब तक भी अहंकार है, जब तक भी ‘मैं’ का भाव है तभी तक परमात्मा का प्राकट्य नहीं है ।
मैं इस संसारी प्यार कि बात नहीं कर रहा हूँ जिसे तुम कहते हो कि ‘I Love You ‘ ,यह तो किसी न किसी शर्त पर निर्भर होता है, जब तक शर्त कि पूर्ति हो रही है तब तक प्यार होता है और जिस क्षण भी शर्त कि पूर्ति नहीं हुई तो प्रेम तिरोहित हो जाता है, ऐसा प्रेम पल में बनता है और पल में मिटता है, यह तो नश्वर है । इसीलिए दुनिया में इतने तलाक हो रहे है और प्रेम विवाह भी ज्यादा सफल नहीं हो पा रहे है क्योंकि प्रेम के पीछे कोई न कोई शर्त छिपी है ।

सुकरात कि पत्नी सुकरात को बहुत परेशान करती थी, गालिया देती थी, फटकारती और एक दिन तो गरम चाय ही उसके मुहं पर डाल दी । लेकिन सुकरात ने उसे कभी तलाक नहीं दिया, उससे दूर नहीं गये क्योंकि वे उससे वास्तविक प्रेम करते थे, वे पत्नी से क्या पुरे ब्रह्मांड से प्रेम करते थे । ऐसा व्यक्ति विवश होता है प्रेम करने को ।"~~महाशुन्य

Love and Contract : प्रेम और सौदा

प्रेम और सौदा

प्रेम में कोई मांग नहीं होती है, केवल देना ही देना है क्योंकि कोई आशा नहीं है, कोई शर्त नहीं है । अगर व्यक्ति को कुछ न कुछ चाहिए तभी वह प्रेम करेगा और अगर मांग पूरी नहीं हुई हो वो प्रेम ख़त्म । असल में इसे प्रेम कहना भी ‘प्रेम’ जैसे पवित्र शब्द को कलंकित करना हैं । इसे मैं सौदा या व्यापार कहता हूँ, सारी कमियों, दोषों के बावजूद प्रेम करना ही वास्तविक प्रेम है ।
जो परमात्मा को प्रेम करते है वे उनसे कुछ भी नहीं मांगते है और जो मांगते है वो परमात्मा से प्रेम नहीं करते है । जो परमात्मा से धन, पद, प्रतिष्ठा, आरोग्य, नौकरी, मकान, स्त्री, संताने इत्यादि कि मांग करते है उन्हें परमात्मा से कोई लेना देना नहीं है उन्हें तो केवल अपने स्वार्थ से मतलब है, वे परमात्मा को भी अपना नौकर समझते है और उनको रिश्वत देने से भी बाज नहीं आते है, यह लोभ है, प्रेम नहीं.
प्रेम तो स्वतंत्रता देता है, बांधता नहीं, मुक्त करता है, जो प्रेम तुम्हे गुलाम बनाये, या आप पर अपनी मालकियत करे, या किसी शर्त पर आधारित है तो समझ लेना वो प्रेम नहीं है सौदा है ।

तू मुझे छोड़कर ठुकराकर भी जा सकती है,
तेरे हाथों में मेरे हाथ है , जंजीरे नहीं ।

राबिया एक सूफी फ़क़ीर हुई उसने एक दिन कुरान में पढ़ा कि शैतान से नफरत करो उसे वो पंक्ति ठीक नहीं मालूम पड़ी तो उसने उसे काट दी कुछ देर बाद उसका भाई हसन वहां आया और उसने देखा कि किसी ने कुरान कि एक लाइन काट राखी है तो हसन ने पूछा राबिया से ये कुफ्र किसने किया ?
राबिया ने कहा ‘ मैंने किया है क्योंकि इसमें जो लिखा था वो मुझे ठीक नहीं लगा क्योंकि मैं शैतान से नफरत नहीं कर सकती हूँ, मैं तो सभी से प्रेम करती हूँ, क्योंकि प्रेम मेरा स्वभाव है, मैं चाहूँ तो भी किसी से नफरत नहीं कर सकती हूँ, मैं विवश हूँ प्रेम करने को ।

आप सभी के भीतर प्रेम का खजाना छिपा है केवल उसे उघाड़ना भर हैं, जैसे मूर्तिकार पत्थर के भीतर छिपी मूर्ति को केवल उसके ऊपर जो व्यर्थ पत्थर है उसे अलग करके मूर्ति को अनावृत करता है, उघाड़ता है, आविष्कृत करता है ।"~~महाशुन्य

Love to Self : स्वयं से प्रेम :

स्वयं से प्रेम : 

प्रेम कि शुरुआत सबसे पहले स्वयं से ही होती है । स्वयं से प्रेम का अर्थ है अपने को जैसे है वैसा का वैसा पूर्ण रूप से स्वीकार करना, अपने से कोई भी शिकायत नहीं करना, अगर आप स्वयं को प्रेम नहीं कर सकते है तो दुसरो से प्रेम करने कि सम्भावना भी कम हो जाती है । जो प्रथम अपने आप से प्रेम करने लगता है, वही प्रेम धीरे-धीरे दुसरो पर भी फैलता है और एक क्षण ऐसा आता है कि यही प्रेम समष्टि में फ़ैल जाता है, पुरे ब्रह्माण्ड को अपने भीतर आविष्ट कर लेता है या ऐसा कहे कि अपने वास्तविक स्वभाव में स्थित हो जाता है जो कि पहले से ही प्रेम-स्वरुप है ।

प्रेम एक घटना है जो हर व्यक्ति के जीवन में कभी भी, कही भी घट सकती है । प्रेम कभी किया नहीं जाता है बल्कि हो जाता है । प्रेम में जिया जाता है, अनुभूत किया जाता है लेकिन प्रेम के बारे में कहना बहुत मुश्किल है और अगर कहने का प्रयास किया कि वह क्षुद्र हो जाता है ।

अगर आप किसी एक व्यक्ति से बेशर्त प्रेम करते है तो वह परमात्मा के मंदिर में पहला कदम होगा और जब अनेक व्यक्तियों को बेशर्त प्रेम कर पाते है तो आप मंदिर में प्रवेश कर जाते है और जब पुरे ब्रह्माण्ड में ये प्रेम फ़ैल जाता है तो आप स्वयं ही परमात्मा हो जाते है उसी मंदिर के ।"~~महाशुन्य