Wednesday, 10 February 2016

Love and Ego : प्रेम और अहंकार

प्रेम और अहंकार : 

परमात्मा निरहंकार है ,उसका कोई अहंकार नहीं है और मनुष्य ने अपने भीतर अहंकार उत्पन्न कर लिया है जो एक अदृश्य दीवार बन गया है परमात्मा और मनुष्य के बीच । परमात्मा और आपके बीच केवल एक दीवार है आपके अहंकार की क्योंकि परमात्मा का कोई अहंकार नही होता है, इसलिए परमात्मा से प्रेम करना आसान है ,केवल आपको स्वयं का अहंकार ही मिटाना है और प्रेम प्रकट हो जाएगा । लेकिन दो व्यक्तियो के बीच दोनो के अहंकार की दो दीवारें है,इसलिए दो व्यक्तियों का आपस में प्रेम करना ज़्यादा कठिन है जब तक दोनो के अहंकारो की दीवारे नहीं हटेगी तब तक प्रेम घटित  नही होगा दो शून्य मिल सकते है ,क्योंकि शुन्य कि कोई दीवार नहीं होती है ,दो अव्यक्ति मिल सकते है परन्तु दो व्यक्ति कभी नहीं मिल सकते है ।
महाशुन्य में शून्य मिल सकता है ,केवल बीच में जो अहंकार ( मैं ) कि दीवार है इसीलिए नहीं मिल पाता । अगर तुम शून्य हो जाओ यानि तुम्हारा अहंकार नष्ट हो जावे तो फिर तुम्हारा प्रेम महाशुन्य से हो जायेगा ,फिर तुममें (शून्य) और महाशुन्य में कोई भी भेद नहीं रह जायेगा ,जैसे एक बूंद सागर में विलीन होकर सागर ही हो जाती है ,वैसे ही एक शून्य महाशुन्य में विलीन होकर महाशुन्य ही हो जाती है । यही वास्तविक प्रेम कि घटना है ।
कबीर को कहना पड़ा :

हेरत हेरत हे सखि रह्या कबीर हेराई,
बुंद समानी समुंद में सो कत हेरी जाई
हेरत हेरत हे सखि रह्या कबीर हेराई,
समुंद समाना बुंद में सो कत हेरी जाई

बूंद सागर में गिरे या सागर बूंद में दोनों ही घटनाये एक है ,एक में बूंद मिटती है और सागर ही हो जाती है और दुसरे में बूंद अपने को सागर ही अनुभव करने लगती है ।
कबीर ने एक दोहे में बहोत ही सुंदर ढंग से कहा है कि :

जब मैं था तो हरी नाही, अब हरी है मैं नाहीं
 प्रेम गली अति सांकरी, ता में दो ना समाई

जब तक दो है तब तक प्रेम नहीं है ,या तो आप रह लो या परमात्मा को रहने दो,ये प्रेम कि गली अति सकरी है ।
मीरा मिटी तो कृष्ण ही हो गई, चैतन्य महाप्रभू मिटे तो परमात्मा कि मस्ती में डूब गए जैसे नमक का पुतला सागर में सागर कि गहराई खोजते-खोजते सागर में ही विलीन हो जाता है और सागर ही हो जाता है । बूंद है आपका अहंकार और सागर है परमात्मा । जब तक अहंकार है तभी तक बूंद है और अहंकार मिटा तो बूंद नहीं रहे सागर ही रह गये।

प्रेम प्रत्येक व्यक्ति कि आत्यंतिक प्यास है क्योंकि हम सब भी प्रेम-स्वरुप ही है । जिसकी जिंदगी में जितना प्रेम है उतना ही वो तृप्त है; जितना प्रेम कम है उतना ही वो अतृप्त है ।"~~महाशुन्य

What is Love ? प्रेम क्या है ?

प्रेम क्या है ?

प्रेम का मतलब है कि एकात्म का अनुभव, एक हो जाना, जहाँ द्वेत समाप्त हो जाता है, जहाँ द्वेत के पार कि अनुभूति है, जहा अद्वेत होता है ।
परमात्मा प्रेम-स्वरूप है, और उसका स्वभाव है प्रेम ,वो सदा ही प्रेम करता है, प्रेममय है । हर मनुष्य प्रेम चाहता है क्योंकि वह भी प्रेम-स्वरूप ही है। जीसस ने भी कहा है –‘God is Love “-‘परमात्मा प्रेम हैं’ या इसे ऐसे भी कह सकते है कि –‘Love is God’-‘प्रेम परमात्मा हैं’,दोनों ही बाते सत्य है क्योंकि प्रेम परमात्मा के कण कण में व्याप्त है ।


किसी साधक ने जब मुझसे पूछा कि-
‘स्वामीजी क्या आप परमात्मा को परिभाषित कर सकते है ? 
तो मैंने कहाँ कि परमात्मा के बारे में बयां करना असंभव है और कोई भी भाषा या शब्द उसे कहने में असमर्थ है ,सत्य, परमात्मा तो अनुभूति का विषय है, कहने का नही, सत्य में तो हुआ जाता है, जिया जाता है, जाना जाता है, जितना भी अभी तक कहा गया है वो भी पूर्ण सत्य नहीं हो सकता है, क्योंकि जो शब्दों के परे है उसको शब्दों में केसे बयाँ  कर सकते है फिर भी जो परिभाषा में अपने अनुभव के आधार पर कहने का प्रयास भर कर सकता हूँ वो में तुम्हें कहता हूँ :    
परमात्मा : "जो अनंत दिशाओ से, अनन्य भाव से, सदा, सभी काल में, सभी प्राणियो को समान रूप से बेशर्त प्रेम करता है, वही परमात्मा है ।~~महाशुन्य

Friday, 28 August 2015

प्रिय बन्धुओ,Dear Bandhuoo,

प्रिय बन्धुओ,

"आप सभी का स्वागत है मेरे आत्म मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा, तीर्थ, पवित्र स्थान मे और आप सभी का भी आपके भीतर ही है भले ही अभी आप जानते हो या ना जानते हो और जिस दिन भी जान लिया जाएगा उस दिन पूरा ब्रह्माण्ड ही आपका मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा, तीर्थ, पवित्र स्थान हो जाएगा।
फिर बाहर के तीर्थो मे जाने की आवश्यकता नही रह जाएगी,
फिर सारे ही धर्म आपके है और आप किसी भी धर्म के नही,
फिर सारे ही शास्‍त्र आपके है और आप किसी भी शास्त्र के नही,
फिर आप वास्तविक धार्मिक होगे।
जो भी भाई, बहन, मित्र, बंधु अगर वास्तविक धार्मिक होने की कला जानना चाहता हो तो उन सभी का स्वागत है,प्रकृति, अस्तित्व, परमात्मा, शक्ति आतुर है आपको सहयोग करने के लिए।"~~महाशून्य

Dear Bandhuoo,

"Welcome to all of you in my self Temple, Mosque, Church, Gurudwara, Shrine, Sacred place,you all also have the same within ,you may know it right now or not and once who will know then the whole universe will be your Temple, Mosque, Church, Gurudwara, Shrine, Sacred place.
Then there will be no need to go to outer pilgrimage,
Then you will have all the religions, and not of any religion,
Then you have all the scriptures and not of any scripture,
Then you will be truly religious.
Whosoever brother, sister, friend if interested to know the art of becoming the genuine religious ,welcome to all of them since Nature, Existence, God, Power is eager to assist you."~~Mahashunya

गुरु-पूर्णिमा : Guru Purnima:

गुरु-पूर्णिमा :


"गुरु-पूर्णिमा एक ऐसा पर्व ऋषि-मुनीओ ने बनाया है जिससे साल में कम से कम एक बार साधकशिष्य अपने जीवन मे आए सभी गुरुओ के प्रति आभारअनुग्रह का भाव प्रगट कर सके ,गुरु को अपना अहंकार समर्पित करें ,अपनी यात्रा मे अग्रसर होते जाए और अंत मे अपना मुक्ति कामोक्ष काआनंद के लक्ष्य को प्राप्त हो जाए।

ये पर्व उनके लिए भी है जिन्होने अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया है और दूसरो को भी उनके लक्ष्य मे सहयोग कर रहे है वे भी उनके जीवन मे आए सभी गुरुओ सेप्रकृति सेपशुओ से, पक्षियो सेअपने संबंधियो सेमित्रो सेपड़ोसियो से इत्यादि से सीखा उन सब के प्रति अपना अनुग्रह का भाव प्रगट करे।
और ये भाव आप अपने मन में भीतर ही भीतर प्रगट कर सकते है अगर गुरु अभी मौजूद नहीं है या आप गुरु के दर पर नही जा सकते है।

अगर केवल उपर से दिखा रहे है और भीतर का भाव गहरा नहीं है तो इसका कोई भी लाभ नही होगा और अगर बाहरी तोर पर दिखावा नहीं है और भीतर से गहरा भाव है तो भी पूरा लाभ मिलेगा चाहे आप गुरु के नज़दीक ना भी हो क्योंकि गुरु कोई शरीर नही है ,वो तो उर्जा हैशक्ति हैतत्व है जो पूरे ब्रह्मांड मे सर्वत्र व्याप्त है ।

ऐसे पर्व पर मे आप सभी को हार्दिक शुभकामनाए देता हूँ और में भी अपने जीवन मे आए सभी गुरुओ के प्रति जिन्होने मुझे अपने लक्ष्य तक पहुँचने मे जानेअंजाने सहायता कीमार्गदर्शन दिया उन सभी को में अपनी आत्मा की गहराई से अपना आभारकृतगयता अनुग्रह का भाव प्रगट करता हूँ।"~~महाशून्य

Guru Purnima:

"Guru Purnima is a festival created by Mystics so that every seeker,disciple at least once in a year can express thanks,gratitute to all the Masters who guided them  and can surrender their ego on the feet of Guru so that they can enhance their progress and achieve the ultimate goal of their life i.e. Salvation and Bliss.

This festival is also for those who have achieved their ultimate goal and helping others to achieve their goals and express their gratitue towards all the Masters, Nature,Animals,Birds,Relatives,Friends,Neighbors etc.
And this sence of gratitute can be inside anly in case of Master is not physically alive or you can not reach to the living master.

There will be no benefit if you are just showing your gratitute from outside but inside you have no sense of gratitute and even if you are not showing it outward and in deep down inside you have a great sence of gratitute this will be more benefial even if you are away from the Master because Master is not a body but Universal Energy,Power, Element which is surrounding the whole universe.

All my Best Wishesh to all of you on this auspicious occasion and I also express my Gratitute ,Thanks from the ultimate depth of my soul towards all the Masters who came in my life and helped knowingly or unknowingly in achieving my ultimate goal."~~Mahashunya

Wednesday, 24 June 2015

Mahashunya talks on " प्रेम का वास्तविक अर्थ : Real Meaning of Love "

Mahashunya talks on " प्रेम का वास्तविक अर्थ : Real Meaning of Love "

"A lovely explanation of the real meaning of love .Love can not be done but it happens on its own accord ,when your ego disappears.It is very easy to get rid of your ego only then to get rid of two person's ego,so it is quite easy to love God then to love a person..................


परमात्मा को समर्पित :

"मैनें कभी कुछ बोला नही है ; तुम ही मुझसे अमृत वचन बरसा रहे हो।

मैनें कभी कुछ किया नही है ; तुम ही मुझसे दिव्य कर्म करवा रहे हो।


मेरा अपना कोई रूप नही है ; तुम ही मुझमें अपना रूप दिखला रहे हो।

मेरा अपना कोई रंग नही है ; तुम ही मुझमें अपना रंग चढ़ा रहे हो।

मेरा अपना कोई गीत नही है ; तुम ही भैरव,भैरवी,रागिनी होकर मुझमे अलोकिक गीत गा रहे हो।

मेरा अपना कोई संगीत नही है ; तुम ही अनहद की धुन मेरे भीतर गूंजा रहे हो।

ये सुर ,ये ताल ,ये सरगम,ये शांति,ये मस्ती भरा नाच,ये आनंद की वर्षा ;

इसमें कुछ भी तो मेरा नहीं है,तुम्ही मुझमें अपना ऐश्वर्य दिखला रहे हो "~~महाशून्य

Tuesday, 5 May 2015

"गोतम बुद्ध के चार आर्य-सत्य : Gautam Buddha's four Noble Truths:

"गोतम बुद्ध के चार आर्य-सत्य :



1.संसार में दुःख है।
2.दुःख का कारण भी है।
3.दुःख को समाप्त करने के उपाय है।
4.एक ऐसी अवस्था भी है , जहाँ दुःख पुर्णतः समाप्त हो जाता है।

दुख क्यों है क्योंकि अज्ञानता हैभ्रम हैअहंकार है अपने को ब्रह्म के अतिरिक्त मानना ही दुख का कारण बनता है और 
इस दुख को दूर करने के उपाय है 'सत्संग और ध्यान साधना' जिससे आपका विवेक जगेगाअज्ञान दूर होगाभ्रम रूपी जाल हटेगा और अहंकार भी पूरी तरह मिट जाएगा तभी फिर ऐसी अवस्था आएगी 'आत्मज्ञान की,समाधि की' जहा फिर दुख पूरी तरह समाप्त हो जाता है।
केवल आत्मज्ञान के द्वारा ही सारे दुखो से छुटकारा संभव है । 

सभी प्यारे और प्रेमी मित्रो को बुद्ध पूर्णिमा की शुभकामनाए ।"~~महाशून्य

Gautam Buddha's four Noble Truths:

1.There is Suffering in the world ;
2.There is Origin of Suffering ;
3.There are measures to eliminate Suffering ;
4.There is also a state where whole sorrow ends.

Why is suffering because there is ignorance, illusion, ego and belief that we are separated from the divine causes suffering.and
 these sufferings can be eliminated by 'Satsang And Meditation' which will awaken your wisdom, eliminate ignorance and confusion and ego will disappear completely ,only then there will be a state of 'Enlightenment, full of Ecstasy', where the suffering ends.
Only after Enlightenment it is possible to get rid of all the suffering.

Happy Buddha Purnima to all my dear lovely and loving friends."~~Mahashunya